“अतः हम HOSPITALITY PROFESSIONALS को चाहिए कि आतिध्य धर्म का पालन करते हुए समस्त प्राणियों में व्याप्त विश्वात्मा भगवान कि सेवा का पुन्य- फल प्राप्त करने का संकल्प ग्रहण करले……..!.”
“अतिधि देवो भवः “ अन्नं बहु कुर्वीत I तद वृतं I न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीतI तद वृतं I ************** गृहागत अतिधि के सत्कार केलिए अन्नप्राप्ति हेतु प्रयास करे ….!. वह एक व्रत हैं….!. निवास हेतु पधारे हुए किसी भी अतिधि को प्रतिकूल वचन न बोले, उसे निराश न करे, यह भी एक व्रत हैं…..!. (तैतिरेय उपनिषद् :- ३ -२ - १० ) पीठं दत्वा साधवे अभ्यागताय I आनियाप: परिनिर्निज्य पादौ I सुखं पृष्ट्वा प्रतिवेद्यात्मसंस्थामI ततो दाद्यादान्नमवेक्ष्य धीर:II ********************************** “विदुजी- धृतराष्ट्र से :- महाभारत -उद्योगपर्व ३७ -२ .” ’ राजन…..!, धीर पुत्रुष कोम चाहिए कि जब कोई सज्जन अतिधि के रूप में घर आये तो , पहले आसन देकर एवं जल लाकर उसके चरण पखारे , फिर उसकी कुशल पूछकर स्तिथि बताएं , तदनंतर अवश्यकता समझकर उसे भोजन कराये……!.’ ********************************************************* चक्शुर्दद्यात्मनो दद्यात वाचं दद्याच सून्रुताम I अनुव्रजेदुपासीत स यज्य: पञ्च दक्षिण: II ***************************************** (महाभारत- वानप्रस्थं २- ६7 ) अतिधि को नेत्र दे ( प्रेमभरी दृष्टी से देखें ), मन दे ( ह्रदय से उसका हित - चिंतन करे ) तथा मधुर वाणी प्रदान करे ……!. जब वह प्रस्थान करें तो कुछ पग उसके साथ जाए और जबतक घर रहें , तबतक उसकी सेवा में निरत रहें ………!. ************************************************************************* न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नाअनलेपनै:I अग्नय: पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यातिथिभोजने II तस्मात् तवं सर्वयत्नेन यातास्चातिधिभोजाने I पादोतकम पादघृतं दीपमन्नम प्रतिश्रयम II प्रयच्छन्ति तू ये राजन नोपसर्पन्ति ते यमम I (महाभारत- वानाप्रस्थं - २००-२२-२४ ) ******************************************* ” मार्कंडेय मुनि युधिष्ठिर से - ” कुंती नंदन ….!. अग्नि देव को जितना संतोष हविष्य का हवं करने तथा पुष्प और चन्दन चढाने से नहीं होता , उतना उन्हें किसी अतिथि को भोजन कराने से होता हैं……!. इसलिए तुम्हे हर संभव प्रयास द्वारा अतिधि को भोजन कराना चाहिए ……!. जो लोग अतिथि को चरण- प्रक्षालन - हेतु जल , पैर कि मालिश केलिए तेल , प्रकाश हेतु दीपक, भोजन केलिए अन्न और आवास हेतु स्थान देते हैं, वे कभी यमद्वार नहीं देखते…..!. **************************************************** “एवं दोषों महान पापन्नामरक्षने I अस्वर्ग्य चायशस्यम च बलवीर्यविनाशनम II’ ***************************************** शरणागत रक्षा नहीं करना महा दोष हैं……!. शरणागत का त्याग स्वर्ग और सुयश कि प्राप्ति को मिटा देता हैं और मनुष्य के बल तथा वीर्य का नाश करता हैं…!.

“अतिधि देवो भवः “

अन्नं बहु कुर्वीत I
तद वृतं I
न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीतI
तद वृतं I
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गृहागत अतिधि के सत्कार केलिए अन्नप्राप्ति हेतु प्रयास करे ….!. वह एक व्रत हैं….!. निवास हेतु पधारे हुए किसी भी अतिधि को प्रतिकूल वचन न बोले, उसे निराश न करे, यह भी एक व्रत हैं…..!.
(तैतिरेय उपनिषद् :- ३ -२ - १० )

पीठं दत्वा साधवे अभ्यागताय I
आनियाप: परिनिर्निज्य पादौ I
सुखं पृष्ट्वा प्रतिवेद्यात्मसंस्थामI
ततो दाद्यादान्नमवेक्ष्य धीर:II
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“विदुजी- धृतराष्ट्र से :- महाभारत -उद्योगपर्व ३७ -२ .”

’ राजन…..!, धीर पुत्रुष कोम चाहिए कि जब कोई सज्जन अतिधि के रूप में घर आये तो , पहले आसन देकर एवं जल लाकर उसके चरण पखारे , फिर उसकी कुशल पूछकर स्तिथि बताएं , तदनंतर अवश्यकता समझकर उसे भोजन कराये……!.’
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चक्शुर्दद्यात्मनो दद्यात वाचं दद्याच सून्रुताम I
अनुव्रजेदुपासीत स यज्य: पञ्च दक्षिण: II
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(महाभारत- वानप्रस्थं २- ६7 )
अतिधि को नेत्र दे ( प्रेमभरी दृष्टी से देखें ), मन दे ( ह्रदय से उसका हित - चिंतन करे ) तथा मधुर वाणी प्रदान करे ……!. जब वह प्रस्थान करें तो कुछ पग उसके साथ जाए और जबतक घर रहें , तबतक उसकी सेवा में निरत रहें ………!.
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न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नाअनलेपनै:I
अग्नय: पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यातिथिभोजने II
तस्मात् तवं सर्वयत्नेन यातास्चातिधिभोजाने I
पादोतकम पादघृतं दीपमन्नम प्रतिश्रयम II
प्रयच्छन्ति तू ये राजन नोपसर्पन्ति ते यमम I
(महाभारत- वानाप्रस्थं - २००-२२-२४ )
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” मार्कंडेय मुनि युधिष्ठिर से - ” कुंती नंदन ….!. अग्नि देव को जितना संतोष हविष्य का हवं करने तथा पुष्प और चन्दन चढाने से नहीं होता , उतना उन्हें किसी अतिथि को भोजन कराने से होता हैं……!. इसलिए तुम्हे हर संभव प्रयास द्वारा अतिधि को भोजन कराना चाहिए ……!. जो लोग अतिथि को चरण- प्रक्षालन - हेतु जल , पैर कि मालिश केलिए तेल , प्रकाश हेतु दीपक, भोजन केलिए अन्न और आवास हेतु स्थान देते हैं, वे कभी यमद्वार नहीं देखते…..!.
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“एवं दोषों महान पापन्नामरक्षने I
अस्वर्ग्य चायशस्यम च बलवीर्यविनाशनम II’
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शरणागत रक्षा नहीं करना महा दोष हैं……!. शरणागत का त्याग स्वर्ग और सुयश कि प्राप्ति को मिटा देता हैं और मनुष्य के बल तथा वीर्य का नाश करता हैं…!.

” TRAVEL DISTRIBUTION SUMMIT…..!”
“ऋषयः प्रहुरेवं माम त्रितम कूपनिपातितम प्रिश्निगर्भ त्रितम पहित्येकतद्वितापदितम ततः स ब्रह्मणः पुत्र आयो ह्युशिवारोस्त्रितः उत्त्त तारोद्पानाद वे पृश्नी गर्भानु कीर्तनाम” जब त्रित मुनि अपने भाईयों द्वारा कुए में गिरा दिए गए ……!, उस समय ऋषिगन मुझसे इस प्रकार प्रार्थना की- ‘पृश्नी गर्भ ’ आप एकत और द्वित ( FIRST AND SECOND) के गिराए हुए त्रितको (THIRD) को डूबनेसे बचाईये ….!. उस वक्त मेरा ‘प्रिश्निगर्भ ” नाम बारम्बार कीर्तन करनेसे ब्रह्माजीके आदि पुत्र ऋषिप्रवर ‘त्रित’ उस कुँए से बहार हो गए ….! ‘प्रिश्निगर्भ ’ पृश्नी - भूमि. गर्भ - अन्दर - UNDERNEATH .GRAINS AND OTHER FOOD SEEDS SPROUTS FROM MOTHER EARTH..! SO ROTI MADE OF WHEAT FLOUR , RICE ETC ALL ARE ‘PRISHNIGARBHA - ‘KRISHNA’ HIMSELF……!.”
“जानाम्यत्यात्मयोंगान्श्च योअहम यस्माच भारत निवृत्तिलक्षणों धर्मिस्त्था अभ्युदयिकोअपि च नारानामअयनं ख्यातं अहमेक: सनातन: आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वे नरसूनव : अयनं मम तत पूर्वमतो नारायणों ह्यहम “ ‘नर” से उत्पन्न होने के कारण जलको ‘नार’ कहा गया हैं ….!. वह नार यानि जल पहले मेरा अयन ( निवासस्थान) था , इसलिए में ’ नारायण ” कहलाता हूँ……!. h2o- water - hydrogen, oxygen and carbondioxide….!. ‘WATER IS ‘GOD OR NARAYAN’ HIMSELF , SO DO NOT WASTE WATER………!.”
“HOSPITALITY BIZ”