’ सुवर्ण पुष्पं प्रिथ्विम चिन्वंती पुरुषास्रय:
शूरश्च कृत विद्यश्च यश्च जानती सेवितं ‘

” शूर , विद्वान, सेवा धर्मके मर्म जाननेवाला पुरुष, अपनी धरतीसे उगनेवाली सुवर्ण लताओं से , स्वर्ण पुष्प को तोड़ेंगे…!. “

” महाभारत- उद्योगपर्व -३५/७४ “