’ सुवर्ण पुष्पं प्रिथ्विम चिन्वंती पुरुषास्रय: शूरश्च कृत विद्यश्च यश्च जानती सेवितं ‘
” शूर , विद्वान, सेवा धर्मके मर्म जाननेवाला पुरुष, अपनी धरतीसे उगनेवाली सुवर्ण लताओं से , स्वर्ण पुष्प को तोड़ेंगे…!. “