“पादाभ्यागन्नपानैस्तु योअतिथिम पूजएंनरा:
पूजितास्तेना राजेंद्र भवामिः न संशयः
शीघ्रम पापाद विनिर्मुक्तो मया चIनुग्रहीकृतः
विमानेनेंदुकल्पेन मम लोकं स गछति
अभ्यागातम श्रान्तामनुव्रजन्ति.
देवाश्च सर्वे पितरो अग्रयाशचा
तस्मिन् द्विजे पूजिते पूजिताःस्यु रगते निराशाः पितरो व्रजन्ति
अतिथिर्यस्य भग्नाशा गृहात प्रतिनिवार्ताते
पितरस्तस्य नाश्नन्ति दशावार्नानी पञ्च च
निर्वासयाती यो विप्रं देशकाल गतम गृहात
पतितास्ताक्षनादेवा जायते नात्र संशयः
चंदालोप्यातिथिः प्राप्तो देशकाले अन्न्कान्क्षाया
अभ्युत्गम्यो गृहस्तेना पूजनीयास्च सर्वदा
मोघं ध्रुवं प्रोर्नायाती मोघमस्य तू पच्यते
मोघमन्नं सदाश्नती योअतिथिम न च पूजयेत
सान्गोपान्गास्तु यो वेदान पठतीह दिने दिने
न चातिथिम पूजयति वृथा भवति स द्विजः
पाकयग्य महय्ग्येइ: सोमसम्स्थाभिरेव च
ये यजन्ति न चर्चान्ति ग्रुहेशातिथिमागतम
तेषाम यशोअभिकामानाम दत्ताम इष्टं च यद् भवेत्
वृथा भवति तट सर्वमाशाया ही तथा हतम..!
राजेन्द्र….!:- जो मनुष्य अतिथिके चरणों में तेल मलकर , उसे भोजन कराकर और पानी पिलाकर उसकी पूजा करता हैं, उसके द्वारा मेरी भी पूजा हो जाती हैं….!. इसमें कोई संशय नहीं है…!. वह मनुष्य तुरंत सब पापोंसे मोक्ष पा जाता हैं और मेरी कृपासे चन्द्रमाके सामान उज्वल विमान पर आर्रोध होकर मेरे परमधामको पधारता हैं….!. यदि थक्का हुआ अभ्यागत जब घर पर आता हैं, तब उसके पीछे - पीछे समस्त देवता, पितृ और अग्नि भी पदार्पण करते हैं ….!. यदि उस अभ्यागत द्विज्की पूजा हुई तो उन देवता आदिकी भी पूजा हो जाती हैनोर उनके निराश लौट्नेपर वे देवता,पितृ आदि निराश होकर लौटते हैं….!. जिसके घरसे अतिथियोंको निराश होकर लौटने पड़ते हैं , उसके पितृ पन्त्रह वर्षों तक भोजन नहीं करते….!. जो देश कालके अनुरूप घरपर आये हुए अतिथिको वहांसे बाहर निकाल देता हैं , वह तत्काल पतित हो जाता है …!. इसमें कोई संदेह नहीं हैं….!. एडी देश कालके अनुसार अन्न्की कामनासे चंडाल भी अतिथिके रूप में आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको सदा उसका सत्कार करना चाहिए …..!. जो अतिथिका सत्कार नहीं करता, उसकी उनी वस्त्र ओढना , अपनेलिए रसोई बनाना और भोजन करना सब कुछ व्यर्थ हैं (वाकय भगवान का व्यंग्य आजकलके सूट-बूट , चलाते , आश्पूश- मोटोर चलाते , -सेल फ़ोन होल्डिंग APPEARANCE के ही तरफ था होगा शायद …!.)….!. जो प्रति दिन सांगोपांग वेदोंका स्वाध्याय करता हैं, किन्तु अतिथिकी पूजा नहीं करता, उस मनुष्य का जीवन व्यर्थ हैं….!. जो लोग पाक-यग्य ,पंच्महायाग्य तथा सोमयाग आदिके द्वारा यजन करते हैं, पर होटल में आये( देशमे आये अतिथिके सत्कार नहीं करते, वे यशकी इच्छासे जो कुछ दान या यग्य करते हैं, वह सब व्यर्थ हो जाता हैं….!.
” अतिथिकी मारी गयी आशा मनुष्यके समस्त शुभ कर्मोंका नाश कर देती हैं……!”.”

“BHAGVAAN SHRI KRISHNJI NE VED VYAASJI KE SRIMAD BHARAT MEIN….!”
ग़लतियाँ बहुत होंगे , उसकेलिए क्षमा याचना…!

ஒ.என் .அப்பா.குருப்(காஞ்சிரம் கோயில்)