“अतिधि देवो भवः “
अन्नं बहु कुर्वीत I
तद वृतं I
न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीतI
तद वृतं I
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गृहागत अतिधि के सत्कार केलिए अन्नप्राप्ति हेतु प्रयास करे ….!. वह एक व्रत हैं….!. निवास हेतु पधारे हुए किसी भी अतिधि को प्रतिकूल वचन न बोले, उसे निराश न करे, यह भी एक व्रत हैं…..!.
(
तैतिरेय उपनिषद् :- ३ -२ - १० )
पीठं दत्वा साधवे अभ्यागताय I
आनियाप: परिनिर्निज्य पादौ I
सुखं पृष्ट्वा प्रतिवेद्यात्मसंस्थामI
ततो दाद्यादान्नमवेक्ष्य धीर:II
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“विदुजी- धृतराष्ट्र से :- महाभारत -उद्योगपर्व ३७ -२ .”
’ राजन…..!, धीर पुत्रुष कोम चाहिए कि जब कोई सज्जन अतिधि के रूप में घर आये तो , पहले आसन देकर एवं जल लाकर उसके चरण पखारे , फिर उसकी कुशल पूछकर स्तिथि बताएं , तदनंतर अवश्यकता समझकर उसे भोजन कराये……!.’
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चक्शुर्दद्यात्मनो दद्यात वाचं दद्याच सून्रुताम I
अनुव्रजेदुपासीत स यज्य: पञ्च दक्षिण: II
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(महाभारत- वानप्रस्थं २- ६7 )
अतिधि को नेत्र दे ( प्रेमभरी दृष्टी से देखें ), मन दे ( ह्रदय से उसका हित - चिंतन करे ) तथा मधुर वाणी प्रदान करे ……!. जब वह प्रस्थान करें तो कुछ पग उसके साथ जाए और जबतक घर रहें , तबतक उसकी सेवा में निरत रहें ………!.
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न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नाअनलेपनै:I
अग्नय: पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यातिथिभोजने II
तस्मात् तवं सर्वयत्नेन यातास्चातिधिभोजाने I
पादोतकम पादघृतं दीपमन्नम प्रतिश्रयम II
प्रयच्छन्ति तू ये राजन नोपसर्पन्ति ते यमम I
(महाभारत- वानाप्रस्थं - २००-२२-२४ )
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” मार्कंडेय मुनि युधिष्ठिर से - ” कुंती नंदन ….!. अग्नि देव को जितना संतोष हविष्य का हवं करने तथा पुष्प और चन्दन चढाने से नहीं होता , उतना उन्हें किसी अतिथि को भोजन कराने से होता हैं……!. इसलिए तुम्हे हर संभव प्रयास द्वारा अतिधि को भोजन कराना चाहिए ……!. जो लोग अतिथि को चरण- प्रक्षालन - हेतु जल , पैर कि मालिश केलिए तेल , प्रकाश हेतु दीपक, भोजन केलिए अन्न और आवास हेतु स्थान देते हैं, वे कभी यमद्वार नहीं देखते…..!.
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“एवं दोषों महान पापन्नामरक्षने I
अस्वर्ग्य चायशस्यम च बलवीर्यविनाशनम II’
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शरणागत रक्षा नहीं करना महा दोष हैं……!. शरणागत का त्याग स्वर्ग और सुयश कि प्राप्ति को मिटा देता हैं और मनुष्य के बल तथा वीर्य का नाश करता हैं…!.